वतन से भी प्यारा, हमें फोन हमारा
अगर गलती से ही हमारा फोन गुम जाए या चोरी हो जाए या कहीं गिर भी जाए तो हमें इतना दुख होता हैं कि जैसे हमारा सब कुछ लुट गया हो? यह तो हुई सिर्फ हमारे फोन की बात, लेकिन जरा सोचिए आज देश की क्या हालत हो गई हैं, हर कोई परेशान हैं, दलित, आदिवासी, पिछड़ा, मुस्लिम, महिला, युवा, मजदूर और यहां तक की सबको अन्न खिलाने वाला अन्नदाता भी आत्महत्या करने को विवश हैं, कितने शर्म की बात हैं कि ऐसी हालत में भी हमारा खून नहीं खोलता और चैन की नींद सो रहे हैं, क्या हमारा देश इस फोन से भी गया बीता हैं???
डरों मत, बदलो सियासत।
सत्यमेव जयते।
-डॉ.पी.आर.मीणा
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